महाभारत 6.64.18
राजापि शिबिरं प्रायात्प्रणिपत्य महात्मनेशिश्ये च शयने शुभ्रे तां रात्रिं भरतर्षभ
rājāpi śibiraṃ prāyātpraṇipatya mahātmaneśiśye ca śayane śubhre tāṃ rātriṃ bharatarṣabha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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