महाभारत 6.64.4
वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथादेवदेवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत्
vāsudevo vasūnāṃ tvaṃ śakraṃ sthāpayitā tathādevadevo'si devānāmiti dvaipāyano'bravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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