महाभारत 6.64.7
शिरसा ते दिवं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी धृताजठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः
śirasā te divaṃ vyāptaṃ bāhubhyāṃ pṛthivī dhṛtājaṭharaṃ te trayo lokāḥ puruṣo'si sanātanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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