महाभारत 6.64.8एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराःआत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चापि सत्तमःevaṃ tvāmabhijānanti tapasā bhāvitā narāḥātmadarśanatṛptānāmṛṣīṇāṃ cāpi sattamaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें