महाभारत 6.74.3
भीमसेनोऽपि समरे संप्राप्य स्वरथं पुनःसमारुह्य महाबाहुर्ययौ येन तवात्मजः
bhīmaseno'pi samare saṃprāpya svarathaṃ punaḥsamāruhya mahābāhuryayau yena tavātmajaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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