महाभारत 6.75.47
अश्वान्मनोजवांश्चास्य कल्माषान्वीतकल्मषःजघान निशितैस्तूर्णं सर्वान्द्वादशभिः शरैः
aśvānmanojavāṃścāsya kalmāṣānvītakalmaṣaḥjaghāna niśitaistūrṇaṃ sarvāndvādaśabhiḥ śaraiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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