महाभारत 6.77.27
चित्रसेनं विकर्णं च तथा दुर्मर्षणं विभोआर्जुनिः समरे राजंस्तव पुत्रानयोधयत्
citrasenaṃ vikarṇaṃ ca tathā durmarṣaṇaṃ vibhoārjuniḥ samare rājaṃstava putrānayodhayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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