महाभारत 6.77.2
अहं द्रोणश्च शल्यश्च कृतवर्मा च सात्वतःअश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ सैन्धवः
ahaṃ droṇaśca śalyaśca kṛtavarmā ca sātvataḥaśvatthāmā vikarṇaśca somadatto'tha saindhavaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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