महाभारत 6.77.5
देशजाश्च हया राजन्स्वारूढा हयसादिभिःगजेन्द्राश्च मदोद्वृत्ताः प्रभिन्नकरटामुखाः
deśajāśca hayā rājansvārūḍhā hayasādibhiḥgajendrāśca madodvṛttāḥ prabhinnakaraṭāmukhāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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