महाभारत 6.78.20
भारद्वाजस्ततः क्रुद्धः शरमाशीविषोपमम्चिक्षेप समरे तूर्णं शङ्खं प्रति जनेश्वर
bhāradvājastataḥ kruddhaḥ śaramāśīviṣopamamcikṣepa samare tūrṇaṃ śaṅkhaṃ prati janeśvara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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