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महाभारत 6.78.23
हतं स्वमात्मजं दृष्ट्वा विराटः प्राद्रवद्भयात्उत्सृज्य समरे द्रोणं व्यात्ताननमिवान्तकम्
hataṃ svamātmajaṃ dṛṣṭvā virāṭaḥ prādravadbhayātutsṛjya samare droṇaṃ vyāttānanamivāntakam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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