महाभारत 6.80.3
स संवार्य रणे राजा प्रेषितान्धर्मसूनुनाशरान्सप्त महेष्वासः कौन्तेयाय समर्पयत्
sa saṃvārya raṇe rājā preṣitāndharmasūnunāśarānsapta maheṣvāsaḥ kaunteyāya samarpayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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