महाभारत 6.82.38
द्रोणश्च समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत्तवव्यधमत्सर्वपाञ्चालांस्तूलराशिमिवानलः
droṇaśca samare kruddhaḥ putrasya priyakṛttavavyadhamatsarvapāñcālāṃstūlarāśimivānalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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