महाभारत 6.82.48
दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणेभीष्मं शांतनवं तूर्णं प्रयातः शिबिरं प्रति
duryodhano'pi nṛpatiḥ parivārya mahāraṇebhīṣmaṃ śāṃtanavaṃ tūrṇaṃ prayātaḥ śibiraṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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