महाभारत 6.84.1
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
भीष्मं तु समरे क्रुद्धं प्रतपन्तं समन्ततःन शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं तपन्तमिव भास्करम्
bhīṣmaṃ tu samare kruddhaṃ pratapantaṃ samantataḥna śekuḥ pāṇḍavā draṣṭuṃ tapantamiva bhāskaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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