महाभारत 6.84.21अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संयुगेपराजितस्य भीमेन निपपात शिरो महीम्aparājitasya sunasaṃ tava putrasya saṃyugeparājitasya bhīmena nipapāta śiro mahīmइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें