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महाभारत 6.85.20
द्रोणस्तु रथिनां श्रेष्ठः सोमकान्सृञ्जयैः सहअभ्यद्रवत संक्रुद्धः प्रेषयिष्यन्यमक्षयम्
droṇastu rathināṃ śreṣṭhaḥ somakānsṛñjayaiḥ sahaabhyadravata saṃkruddhaḥ preṣayiṣyanyamakṣayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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