महाभारत 6.86.40
भूमिष्ठमथ तं संख्ये संप्रदृश्य ततः पुनःपरिवार्य भृशं सर्वे ग्रहीतुमुपचक्रमुः
bhūmiṣṭhamatha taṃ saṃkhye saṃpradṛśya tataḥ punaḥparivārya bhṛśaṃ sarve grahītumupacakramuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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