महाभारत 6.86.53
ते संरब्धाः समागम्य द्विसाहस्राः प्रहारिणःअचिराद्गमयामासुः प्रेतलोकं परस्परम्
te saṃrabdhāḥ samāgamya dvisāhasrāḥ prahāriṇaḥacirādgamayāmāsuḥ pretalokaṃ parasparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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