महाभारत 6.86.59
तथा स राक्षसश्रेष्ठः शरैः कृत्तः पुनः पुनःसंबभूव महाराज समवाप च यौवनम्
tathā sa rākṣasaśreṣṭhaḥ śaraiḥ kṛttaḥ punaḥ punaḥsaṃbabhūva mahārāja samavāpa ca yauvanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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