महाभारत 6.86.70सकुण्डलं समुकुटं पद्मेन्दुसदृशप्रभम्इरावतः शिरो रक्षः पातयामास भूतलेsakuṇḍalaṃ samukuṭaṃ padmendusadṛśaprabhamirāvataḥ śiro rakṣaḥ pātayāmāsa bhūtaleइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें