महाभारत 6.9.13
अनिष्पन्दाः सुगन्धाश्च निराहारा जितेन्द्रियाःदेवलोकच्युताः सर्वे तथा विरजसो नृप
aniṣpandāḥ sugandhāśca nirāhārā jitendriyāḥdevalokacyutāḥ sarve tathā virajaso nṛpa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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