महाभारत 6.91.13
अहं द्रोणः कृपो द्रौणिः कृतवर्मा च सात्वतःशल्यश्च सौमदत्तिश्च विकर्णश्च महारथः
ahaṃ droṇaḥ kṛpo drauṇiḥ kṛtavarmā ca sātvataḥśalyaśca saumadattiśca vikarṇaśca mahārathaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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