महाभारत 6.91.32
कुञ्जरेण प्रभिन्नेन सप्तधा स्रवता मदम्पर्वतेन यथा तोयं स्रवमाणेन सर्वतः
kuñjareṇa prabhinnena saptadhā sravatā madamparvatena yathā toyaṃ sravamāṇena sarvataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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