महाभारत 6.91.4
भवन्तं समुपाश्रित्य वासुदेवं यथा परैःपाण्डवैर्विग्रहो घोरः समारब्धो मया प्रभो
bhavantaṃ samupāśritya vāsudevaṃ yathā paraiḥpāṇḍavairvigraho ghoraḥ samārabdho mayā prabho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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