महाभारत 6.92.39
असिं चिक्षेप समरे सौभद्रस्य महात्मनःआरुरोह रथं चैव हार्दिक्यस्य महात्मनः
asiṃ cikṣepa samare saubhadrasya mahātmanaḥāruroha rathaṃ caiva hārdikyasya mahātmanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें