महाभारत 6.93.27
दक्षिणं दक्षिणः काले संभृत्य स्वभुजं तदाहस्तिहस्तोपमं शैक्षं सर्वशत्रुनिबर्हणम्
dakṣiṇaṃ dakṣiṇaḥ kāle saṃbhṛtya svabhujaṃ tadāhastihastopamaṃ śaikṣaṃ sarvaśatrunibarhaṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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