महाभारत 6.93.32
कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणयःप्रोत्सारयन्तः शनकैस्तं जनं सर्वतोदिशम्
kañcukoṣṇīṣiṇastatra vetrajharjharapāṇayaḥprotsārayantaḥ śanakaistaṃ janaṃ sarvatodiśam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें