महाभारत 6.94.18
सुखं स्वपिहि गान्धारे श्वोऽस्मि कर्ता महारणम्यज्जनाः कथयिष्यन्ति यावत्स्थास्यति मेदिनी
sukhaṃ svapihi gāndhāre śvo'smi kartā mahāraṇamyajjanāḥ kathayiṣyanti yāvatsthāsyati medinī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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