महाभारत 6.97.14
अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो नवतिं नतपर्वणाम्चिक्षेप निशितान्बाणान्राक्षसस्य महोरसि
abhimanyustataḥ kruddho navatiṃ nataparvaṇāmcikṣepa niśitānbāṇānrākṣasasya mahorasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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