महाभारत 6.97.32
उभयोः सदृशं कर्म स पितुर्मातुलस्य चरणे बहुविधं चक्रे सर्वशस्त्रभृतां वरः
ubhayoḥ sadṛśaṃ karma sa piturmātulasya caraṇe bahuvidhaṃ cakre sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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