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महाभारत 6.98.2
प्रियो हि पाण्डवो नित्यं भारद्वाजस्य धीमतःआचार्यश्च रणे नित्यं प्रियः पार्थस्य संजय
priyo hi pāṇḍavo nityaṃ bhāradvājasya dhīmataḥācāryaśca raṇe nityaṃ priyaḥ pārthasya saṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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