महाभारत 6.98.32व्यधमत्स गजानीकं गदया पाण्डवर्षभःमहाभ्रजालमतुलं मातरिश्वेव संततम्vyadhamatsa gajānīkaṃ gadayā pāṇḍavarṣabhaḥmahābhrajālamatulaṃ mātariśveva saṃtatamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें