महाभारत 6.98.7
शरवृष्ट्या पुनः पार्थश्छादयामास तं रणेप्रजज्वाल च रोषेण गहनेऽग्निरिवोत्थितः
śaravṛṣṭyā punaḥ pārthaśchādayāmāsa taṃ raṇeprajajvāla ca roṣeṇa gahane'gnirivotthitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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