महाभारत 7.1.17
विधाय रक्षां भीष्माय समाभाष्य परस्परम्अनुमान्य च गाङ्गेयं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्
vidhāya rakṣāṃ bhīṣmāya samābhāṣya parasparamanumānya ca gāṅgeyaṃ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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