महाभारत 7.10.5
प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम्मुरुं चाचलसंकाशमवधीत्पुष्करेक्षणः
pralambaṃ narakaṃ jambhaṃ pīṭhaṃ cāpi mahāsurammuruṃ cācalasaṃkāśamavadhītpuṣkarekṣaṇaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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