महाभारत 7.101.33
गदां विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टकेतुरमर्षणःतोमरं व्यसृजत्तूर्णं शक्तिं च कनकोज्ज्वलाम्
gadāṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭaketuramarṣaṇaḥtomaraṃ vyasṛjattūrṇaṃ śaktiṃ ca kanakojjvalām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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