महाभारत 7.101.72
कृच्छ्रान्दुर्योधनो लोकान्पापः प्राप्स्यति दुर्मतिःयस्य लोभाद्विनिहताः समरे क्षत्रियर्षभाः
kṛcchrānduryodhano lokānpāpaḥ prāpsyati durmatiḥyasya lobhādvinihatāḥ samare kṣatriyarṣabhāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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