महाभारत 7.102.38
वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनःतस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम्
vardhate haviṣevāgniridhyamānaḥ punaḥ punaḥtasya lakṣma na paśyāmi tena vindāmi kaśmalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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