महाभारत 7.102.53
परिष्वक्तस्तु कौन्तेयो धर्मराजेन भारतआघ्रातश्च तथा मूर्ध्नि श्रावितश्चाशिषः शुभाः
pariṣvaktastu kaunteyo dharmarājena bhārataāghrātaśca tathā mūrdhni śrāvitaścāśiṣaḥ śubhāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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