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महाभारत 7.103.35
येन शक्रं रणे जित्वा तर्पितो हव्यवाहनःस हन्ता द्विषतां संख्ये दिष्ट्या जीवति फल्गुनः
yena śakraṃ raṇe jitvā tarpito havyavāhanaḥsa hantā dviṣatāṃ saṃkhye diṣṭyā jīvati phalgunaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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