महाभारत 7.105.14
गतौ हि सैन्धवं वीरौ युयुधानवृकोदरौसंप्राप्तं तदिदं द्यूतं यत्तच्छकुनिबुद्धिजम्
gatau hi saindhavaṃ vīrau yuyudhānavṛkodarausaṃprāptaṃ tadidaṃ dyūtaṃ yattacchakunibuddhijam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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