महाभारत 7.105.20
यत्र ते परमेष्वासा यत्ता रक्षन्ति सैन्धवम्तत्र याहि स्वयं शीघ्रं तांश्च रक्षस्व रक्षिणः
yatra te parameṣvāsā yattā rakṣanti saindhavamtatra yāhi svayaṃ śīghraṃ tāṃśca rakṣasva rakṣiṇaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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