महाभारत 7.106.34
ततोऽचिन्त्य महावेगान्कर्णकार्मुकनिःसृतान्समाश्लिष्यदसंभ्रान्तः सूतपुत्रं वृकोदरः
tato'cintya mahāvegānkarṇakārmukaniḥsṛtānsamāśliṣyadasaṃbhrāntaḥ sūtaputraṃ vṛkodaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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