महाभारत 7.106.53
ते जग्मुर्धरणीं सर्वे कर्णं निर्भिद्य मारिषयथा हि जलदं भित्त्वा राजन्सूर्यस्य रश्मयः
te jagmurdharaṇīṃ sarve karṇaṃ nirbhidya māriṣayathā hi jaladaṃ bhittvā rājansūryasya raśmayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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