महाभारत 7.108.25
प्राहिणोन्नव संरब्धः शरान्बर्हिणवाससःस्वर्णपुङ्खाञ्शिलाधौतान्यमदण्डोपमान्मृधे
prāhiṇonnava saṃrabdhaḥ śarānbarhiṇavāsasaḥsvarṇapuṅkhāñśilādhautānyamadaṇḍopamānmṛdhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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