महाभारत 7.108.35
गच्छ दुर्जय राधेयं पुरा ग्रसति पाण्डवःजहि तूबरकं क्षिप्रं कर्णस्य बलमादधत्
gaccha durjaya rādheyaṃ purā grasati pāṇḍavaḥjahi tūbarakaṃ kṣipraṃ karṇasya balamādadhat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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