महाभारत 7.11.5
ततो दुर्योधनश्चिन्त्य कर्णदुःशासनादिभिःतमथोवाच दुर्धर्षमाचार्यं जयतां वरम्
tato duryodhanaścintya karṇaduḥśāsanādibhiḥtamathovāca durdharṣamācāryaṃ jayatāṃ varam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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