महाभारत 7.112.32
स रवस्तस्य शूरस्य धर्मराजस्य भारतआचख्याविव तद्युद्धं विजयं चात्मनो महत्
sa ravastasya śūrasya dharmarājasya bhārataācakhyāviva tadyuddhaṃ vijayaṃ cātmano mahat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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