महाभारत 7.112.38
यद्द्यूतकाले दुर्बुद्धिरब्रवीत्तनयस्तवयच्च कर्णोऽब्रवीत्कृष्णां सभायां परुषं वचः
yaddyūtakāle durbuddhirabravīttanayastavayacca karṇo'bravītkṛṣṇāṃ sabhāyāṃ paruṣaṃ vacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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